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दिल को छू लेनेवाली आवाज – मोहम्मद रफी (THE MAESTRO WITH A TOUCHING VOICE: MOHD. RAFI)

January 14, 2022

  लगता है भगवान भी कभी कभी गलती कर देते है। एक आवाज जो उन्होंने स्वर्ग के लिए बनाई थी, उसको गलती से शायद धरती पर भेज दिया गया। जिस आवाज के बिना सुनहरा दौर 'सुनहरा' नहीं कहा जा सकता, ऐसी दिल को छू लेने वाली आवाज से अलंकृत कुछ सदाबहार गीत:

⋇ आवाज:

⋇ गीत:

video load time: 2-5 sec

  अपने पसंदीदा गीतों का आनंद लीजिए!

  जिस व्यक्ति का दिल जितना साफ होता है उसकी आवाज उतनी ही मीठी होती है, उसको बार बार सुनने को जी चाहता है। अधिकतर गायकों की आवाज 'गले' से निकलती है, बहुत कम गायक 'दिल' से गाते हैं और ऐसे गायक तो बहुत ही विरले हैं जिनकी आवाज 'आत्मा' से निकलती है। शायद यही रहस्य है जिसके कारण रफी साहब की आवाज हमें छू लेती है, रोमांचित करती है, सुनने वाले के जीवन का अविभाज्य अंग बन जाती है और हमारी दुवाएँ, हमारी शिकायतें परमात्मा के द्वार तक पहुँचा देती है। कुछ चीजों की नकल उतारना (duplicate) असंभव-सा होता है, रफी-लता की आवाजें इस श्रेणी की हैं। कविता कृष्णमूर्ति ने क्या खूब कहा है। वे कहती है - जब भी मैं रफिजी को सुनती हूँ, मैं शुद्ध हो जाती हूँ, सुरों में डूब जाती हूँ और मुझे लगता है की ईश्वर तक पहुँचने का यही रास्ता है।

  रफी साहब एक इन्तेहाई शर्मिले और बहुत ही खामोश आदमी थे। बात भी करते थे तो इतने नम्र अंदाज में कि सुनने वाला यह सोचकर हैरान हो जाता कि इतने महान पद पर विराजमान होते हुए भी इन्हे अहंकार का स्पर्श तक नहीं हुआ है। उनके मुख से ज्यादातर निकलने वाले शब्द हुआ करते थे 'जी हाँ' या 'जी नहीं'। खाली समय में खामोश बैठे रहते, अपने चेहरे पे वही चिरपरिचित संतोषपूर्ण हँसी को धारण किये हुए, जो उनका स्थायी भाव था।

  यहाँ पर उस रहस्यमयी हँसी का जिक्र करना जरूरी है जो रफी साहब के मुखमण्डल पर हमेशा दृग्गोचर हुआ करती थी। उनके प्रायः प्रत्येक फोटो में यह हँसी दिखाई देती है। इस प्रकार की हँसी उसी आदमी के चेहरे पर विराजमान रहती है जो अपने जीवन से पूर्ण रूप से संतुष्ट है, समाधानी है और जिसकी कुछ भी पाने की कोई कामना अभी शेष नहीं है और जो कुछ उसने पाया वह औरों के साथ जो बांटना चाहता हो। अन्यथा, पग पग पर जहाँ समस्याओं का सामना करना पडता है ऐसे जीवन में प्रसन्नता से भरे ऐसे चेहरे का दर्शन कितनी दुर्लभ बात है।

  रफी के गाने 'सुनने' को बडे आसान लगते है लेकिन 'गाने' के लिए होते है बडे कठिन। मन्ना डे भी कहते है - हममें से कोई भी रफी नहीं हो सकता। और अगर कोई गा भी ले तो आवाज की वह गहराई, वह कशिश पैदा करने के लिए रफी जैसी ही बेमिसाल कुदरती प्रतिभा का होना जरूरी है। रफी साहब की और एक विशेषता यह थी की उनको पैसा, प्रसिद्धि या ग्लैमर का तनिक भी आकर्षण नहीं था। यहाँ तक की जिन फिल्मों के लिए वे गाते थे उन फिल्मों का भी उन्हें आकर्षण नहीं था। परिवार वाले जब बहुत ही जिद करते तब उनका मन रखने के लिए वो कभी कभी कोई फिल्म देख लेते। उन्होंने शराब को कभी छुआ नहीं लेकिन अपने सुरों के नशे में सारी दुनिया को मदहोश कर दिया।

  संगीतकाररवि के निर्देशन में जब 'बाबुल की दुआएँ लेती जा' यह गीत रिकॉर्ड हो रहा था, तब रफी बडे भावुक हो जाते और उनकी आँखों में आँसू आ जाते। कई टेक लेने के बाद यह गाना रिकॉर्ड हो पाया। गाना रिकॉर्ड होने के दो दिन पहले ही रफी साहब की बेटी की सगाई हुई थी। महान गायकों की यह विशेषता होती है कि जब वे गाते हैं तब शब्दों के माध्यम से व्यक्त होने वाले भाव के साथ एकरूप होकर गाते हैं। यही कारण है आशाजी 'अब के बरस भेज भैया को बाबुल' गाते वक्त और किशोर कुमार 'जिंदगी का सफर है ये कैसा सफर' गाते वक्त ऐसे ही भावुक बन गए थे। वसंत प्रभु के संगीत निर्देशन में ऐसे कुछ मराठी गीत भी हैं जो गाते वक्त स्वयं लता जी भी अत्यंत भावुक हो गयी थी।

  आजकल यूट्यूब पे कुछ वीडियो चल रहे हैं जिसमे बताया जा रहा है कि आशाजी ने रफी साहब के बारे में कुछ उल्टी-सीधी बातें करती है। यह तो सरेआम झूठ है, ऐसी कोई बात आशाजी ने रफी साहब के बारे में कभी कही नहीं। ये सभी कलाकार संगीत के उपासक थे जो कला का हमेशा सम्मान करते थे, अगर एक-दूसरे के दोष देखते रहते या ईर्ष्या करते तो महान गायकों के पद पर विराजमान न होते। एक बात जरूर है, गीत की कोई लाइन को किस तरह से गाया जाए इसको लेकर संगीतकार और गायकों के बीच बहस हुआ करती, (खास कर किशोर कुमार जब होते) जिसके परिणामस्वरूप एक सुमधुर गीत का जन्म हो जाता। रफी साहब ने न कभी ऐसे बहस में हिस्सा लिया, न कभी रॉयल्टी को लेकर अडे रहे। भारतीय फिल्म संगीत के उस सुनहरे दौर में किसी भी मजहब, जाती या पंथ की दीवारें कभी बीच में खडी नहीं हुई। अगर ऐसा होता तो गीतकार शकील बदायुनी, संगीतकार नौशाद और गायक मोहम्मद रफी, जो तीनों भी हिन्दू नहीं थे, ओ दुनिया के रखवाले, मन तरपत हरी दर्शन को आज, या मधुबन में राधिका नाचे रे जैसे गीतों का निर्माण न करते।

  रफी जब नृत्य गीत गाते है तो आप नृत्य करते है। रफी जब उदास गीत गाते है तब आप रोते है। वो जब प्रेम गीत गाते है तब लैला-मजनुओं के दिलों की धडकनें बढ जाती है। वो जब बाल गीत गाते है तब स्वयं एक शिशु बन जाते है और जब भक्ति गीत गाते है तब फरिश्तें डोलते हैं। रफी जब तुम्हारे भीतर उतरते है तब वो आपके हो जाते है और आप उनके हो जाते हैं।

  मात्र ५५ साल के उम्र में खुदा ने रफी साहब को अपने मनोरंजन के लिए जन्नत में बुला लिया। विरासत के रूप में वो छोड गए अपने दिलकश अमर सुर जिनका जादू कई सदियों तक बरकरार रहेगा। अपने ३६ साल के सांगीतिक करियर में रफी साहब ने एस. डी. बर्मन, नौशाद, मदन मोहन, सलिल चौधरी, ओ. पी. नैय्यरआर. डी. बर्मन, चित्रगुप्त, रवि, जयदेव, रोशन, शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी आदि सभी संगीतकारों के निर्देशन में सैकडो गीत गाये।

  रफी साहब को 'भारत रत्न' न मिलने से उनके चाहने वाले दुखी रहते है। जिस व्यक्ति को करोडों लोगों ने अपने दिलों में सम्मान और प्रेम का स्थान दिया हो उस व्यक्ति के लिए कोई पुरस्कार विशेष मायने नहीं रखता। मोहम्मद रफी को भारत रत्न की जरूरत नहीं है, शायद 'भारतरत्न' को ही मोहम्मद रफी की जरुरत हो सकती है। हम लोग रफी तो नहीं बन सकते लेकिन रफी जैसे अच्छे इंसान बनने की कोशिश हमने जरूर करनी चाहिए!

  *रफी साहब के गीतों का सबसे ज्यादा मजा तब आता है जब आप उन गीतों को इयरफोन में या बडे स्पीकर पर सुने जाते हैं। रफी साहब का कौन सा गीत आपके दिल के सबसे ज्यादा करीब है? कमेन्ट्स में जरूर बताइएगा!

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Snow

8 comments:

  1. Supper👍👍👍

    ReplyDelete
  2. Very heart touching song

    ReplyDelete
  3. Every Music Director and all Male females singer you have included of Golden Era this is like dream chum true and all Great's in ne umbrella but I not getting Mannadeys songs pl include them .or might be I am not able to track his songs

    ReplyDelete

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