जहाँ दिल है वहाँ दर्द है, जहाँ दर्द है वहाँ आह है, जहाँ आह है वहाँ शायर है और जहाँ शायर है वहाँ गज़ल है। यहाँ किसी अभागे दिल को ठेच पहुँचना जरुरी है ताकि किसी गज़ल का जन्म हो और उस दर्द-ए-दिल को किसी शायरी में पिरोकर हम उत्सव मनाये! गज़ल की शुरुआत होती है एक दिल की 'आह' से और इसका अंत होता है श्रोताओं की 'वाह' से !
आइये, सुनिए कुछ चंद लोकप्रिय गज़लें और मजा लें उन मजबूर, बेबस सुरों का जो अपनी दास्ताँ गम के गहनें पहनकर प्रस्तुत कर रहे हैं।
गज़लों की महफिल एक रूहानी सुकून और जज्बातों की गहरी तडप लेकर आती है। जब गायक की शांत और दिल को छू लेने वाली आवाज गूँजती है, तो फिजा में एक अलग ही नशा छा जाता है। श्रोता पूरी तरह मंत्रमुग्ध होकर शब्दों में खो जाते हैं, जिससे वह शाम बेहद सुदृढ और यादगार बन जाती है।
इस गज़लों की महफिल को सजाया है कई बेहतरीन आवाजों ने, जिसमें शामिल है जगजीत सिंह की मखमली आवाज, पंकज उधास का उदास स्वर, उस्ताद गुलाम अली की भावनात्मक गहराई, दरबारी और शास्त्रीय अंदाज से भरा बेगम अख्तर का असाधारण लचीला स्वर, दर्द और मोहब्बत के संगम पर विचरण करनेवाला मेहदी हसन के सुगम सूर, आसमान की ऊँचाई को छूने वाला नुसरत फतेह अली खान की सदा, उतार-चढाव से भरा अनूप जलोटा का जीवंत गायन, फरीदा खानम और भूपिंदर सिंह की रूहानी आवाजें और बहुत कुछ।
मदिरा की तरह गज़ल भी रंग लाती है मगर.... आहिस्ता... आहिस्ता ...
⮞ फिल्म संगीत की सुरीली धरोहर से :-
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गीत बहार: The Garden of Songs.
































Excellent
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