१९९०-९९ का दशक हिंदी फिल्म संगीत के लिए मानो एक सुकूनभरी वापसी का संदेश लेकर आया - एक ऐसा मोड, जहां धडकनों की चकाचौंध से हटकर भावनाओं की गहराई फिर से केंद्र में आ बैठी। आशिकी और मैंने प्यार किया जैसी अपार सफलता पाने वाली फिल्मों ने संगीत को फिर से प्रेम, कोमलता और संवेदनाओं के रंगों में रंग दिया। यह समय था जब श्रोताओं के मन में पुरानी मधुरता की प्यास जाग उठी, और संगीत ने उसी अनुरूप अपनी दिशा बदली।
इस दशक में धुनों की आत्मा को फिर से प्रतिष्ठा मिली। लय की तीव्रता के स्थान पर भाव, काव्य और सजीव वाद्य संयोजन को महत्व दिया गया। राम-लक्ष्मण, नदीम-श्रवण और जतिन-ललित जैसे संगीतकारों ने मधुर, सरस और हृदयस्पर्शी रचनाओं का ऐसा संसार रचा, जिसने श्रोताओं को फिर से सुरों के जादू में बांध लिया। उनकी धुनें सरल होते हुए भी गहराई से भरी थीं - मानो हर गीत एक मधुर कथा कह रहा हो।
संगीत अब और अधिक स्वच्छ, परतदार और सर्वग्राही हो गया - ऐसा कि हर आयु वर्ग के श्रोता उसमें अपना प्रतिबिंब देख सकें। रिकॉर्डिंग तकनीक ने भी इस दौर में अभूतपूर्व प्रगति की, जिससे ध्वनि की गुणवत्ता अत्यंत परिष्कृत हो गई। दूरदर्शन और अन्य चैनलों पर प्रसारित होने वाले संगीत वीडियो ने गीतों को फिल्मों से अलग एक स्वतंत्र पहचान दी - वे स्वयं में ही लोकप्रियता के शिखर छूने लगे।
लता मंगेशकर और आशा भोंसले, ये दो स्वर-सरोवर, इस दशक में भी अपनी मधुरता से श्रोताओं को सराबोर करते रहे। पांच दशकों से अधिक समय तक अपनी जादुई आवाज से संगीत को समृद्ध करने वाली इन दोनों बहनों ने इस युग में भी अपनी गरिमा और प्रभाव को अक्षुण्ण बनाए रखा।
किन्तु इस दशक का सबसे महत्वपूर्ण मोड था ए. आर. रहमान का आगमन। १९९२ में। 'रोजा' के साथ उन्होंने संगीत में एक ऐसी क्रांति की, जिसने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक नया सेतु बना दिया। इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों, कर्नाटक शास्त्रीयता, विश्व संगीत की झलक और लोकप्रियता के सहज भाव - इन सबका ऐसा संगम पहले कभी नहीं देखा गया था। यह एक नई ध्वनि थी, एक नई अनुभूति, जिसने आने वाले समय का मार्ग प्रशस्त किया।
उदित नारायण, कुमार सानू और अलका याज्ञिक जैसे गायकों की मधुर और रसीली आवाजें इस दशक के हर कोने में गूंजती रहीं। उनके गीतों में प्रेम की मिठास थी, एक सरलता थी, जो सीधे हृदय को स्पर्श करती थी। दशक के अंत तक संगीत में सूफी, लोक और पॉप के रंग भी घुलने लगे, जिससे यह और अधिक परिपक्व और विविधतापूर्ण बन गया।
इस दशक की बहुचर्चित फिल्में रहीं : दिल, घायल, आशिकी, साजन, सडक, दिल है कि मानता नहीं, फूल और कांटे, बेटा, जो जीता वही सिकंदर, बाजीगर, डर, हम आपके हैं कौन, अंदाज अपना अपना, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे, करण अर्जुन, रंगीला, दिल तो पागल है, बॉर्डर, कुछ कुछ होता है और हम दिल दे चुके सनम - ये सभी फिल्में आज भी उस मधुर दशक की जीवंत स्मृतियां संजोए हुए हैं।
⮞ फिल्म संगीत की सुरीली सरगम से :-
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गीत बहार: The Garden of Songs.
































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