१९७०-७९ का दशक भी भावनाओं से भीगे एकल गीतों और चुलबुले युगलों की मधुर परंपरा को साथ लेकर आगे बढा। पर अब समय बदल रहा था—स्टूडियो की सीमित सादगी से निकलकर निर्देशन की नवोन्मेषी दृष्टि ने संगीत को नई उडान दी। पूरब और पश्चिम के सुर आपस में घुलने लगे, और संगीत में एक नई ताजगी, एक नई ऊर्जा जन्म लेने लगी।
इसी दौर में राहुल देव बर्मन (पंचम दा) ने मानो संगीत की दुनिया में भूचाल ला दिया। अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र जैसे प्रभावशाली नायकों की छवि ने गीतों को और अधिक सजीव, उन्मुक्त और साहसी बना दिया। धुनों में अब कच्चापन था, एक तीव्रता थी, और प्रयोगों का निडर साहस भी। पश्चिमी फंक, रॉक गिटार की गूंज, सायकेडेलिक ध्वनियां, यहां तक कि अफ्रीकी तालों की धडकन भी इन सुरों में बसने लगी।
किशोर कुमार इस युग की सबसे प्रखर पुरुष आवाज बनकर उभरे—उनकी बेफिक्र, चंचल शैली उस समय की विद्रोही ऊर्जा का सटीक प्रतिबिंब थी। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और कल्याणजी-आनंदजी ने भव्य, गूंजदार वाद्य संयोजनों से संगीत को एक विराट आयाम दिया। परंपरागत धुनें अब पीछे छूटने लगीं, और लय तथा मस्ती के गीत अधिक बजने लगे।
संगीत अब बीते दिनों की मृदुल स्मृतियों से आगे बढकर विविध रंगों से भरे जीवंत ध्वनि-दृश्यों में ढलने लगा। यह वह समय था जब समाज बदल रहा था, और दुनिया के सुर भारतीय गीतों में उतर रहे थे। हिंदी फिल्म संगीत पहली बार सच में वैश्विक धडकनों से जुडा हुआ प्रतीत हुआ - अधिक आधुनिक, अधिक ऊर्जावान।
मोहम्मद रफी का असमय निधन संगीत जगत के लिए गहरा आघात था, पर इसी के साथ के. जे. येसुदास, अमित कुमार जैसे मधुर स्वरों का उदय भी हुआ, जिन्होंने इस युग को नई गरिमा प्रदान की।
सांगीतिक सुरों से सजी इस दशक की लोकप्रिय फिल्में थी : जॉनी मेरा नाम, सच्चा झूठा, खिलौना, पूरब और पश्चिम, हमजोली, आनंद, कारवां, कटी पतंग, हरे रामा हरे कृष्णा, पाकीजा, अमर प्रेम, बॉबी, यादों की बारात, अभिमान, शोले, आंधी, चुपके चुपके, कभी कभी, अमर अकबर एंथनी, मुकद्दर का सिकंदर, डॉन, गोल माल।
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गीत बहार: The Garden of Songs.


























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